Birth and place

भाद्रपद कृष्ण नवमी, वि.सं. 2012, विद्यालयानुसार 10.10.1962
ग्राम / पत्रालय- ऐंहन, जिला- हाथरस (उ.प्र.)।

Living place

भागलभीम, भीनमाल, जालोर, राजस्थान- ३४३ ०२९ भारत

Education and skill

वैदिक शास्त्रों
वेद, दर्शन, उपनिषद्, मनुस्मृति, वाल्मीकीय रामायण, महाभारत, निरुक्त, शिक्षा, छनदशास्त्र, महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत सम्पूर्ण साहित्य, विभिन्न शीर्ष आर्य विद्वानों का साहित्य व वर्तमान में ब्राह्मण ग्रन्थ
सम्प्रदायों ग्रन्थों
पुराण, कुरान, बाईबिल, धम्मपद आदि
भौतिक विज्ञान
परमाणु-नाभिकीय व सृष्टि विज्ञान
गणित
परमाणु-नाभिकीय व सृष्टि विज्ञान

Research Field

काॅस्माॅलोजी
एस्ट्रोफिजिक्स
सोलर-प्लाज्मा
ऐस्ट्रोनाॅमी
पार्टिकल-न्यूक्लीयर-एटॅमिक फिजिक्स

Working on

ऐतरेय ब्राह्मण का वैज्ञानिक भाष्य पूर्ण

IMPROVE THEORY

बिग बैंग माॅडल
एटरनल यूनीवर्स
स्टिंªग थ्यौरी आदि

intrest/Hobbies

सत्य, अहिंसा, अस्तेय
देशभक्ति
स्वाभिमान व न्यायप्रियता

Solutons

सामाजिक, साम्प्रदायिक, राजनैतिक, भौगोलिक, पर्यावरणीय व आर्थिक आदि समस्याओं
इस कार्य से भारतीय व विश्व समाज की अनेक समस्याओं के समाधान ( आतंकवाद, निर्धनता, असमानता, अशिक्षा, पर्यावरण प्रदूषण, स्वेच्छाचारिता जैसे- दुराचार आदि )

जन्मस्थान व वंश परिचय

ग्राम $ पत्रालय- ऐंहन, जिला- हाथरस (उ.प्र.)। ऐंहन ग्राम आर्य समाज तथा स्वाधीनता संग्राम के क्षेत्र में सक्रिय रहे प्रजामण्डल का प्रसिद्ध केन्द्र रहा है। कदाचित् इस ग्राम में महर्षि दयानन्द जी सरस्वती के जीवन काल अथवा उनके दिवंगत होने के कुछ कालोपरान्त ही आर्य समाज की स्थापना हो चुकी थी। इस ग्राम में महर्षि को विष देने वाला पाचक जगन्नाथ अथवा धौड़मिश्र कुष्ठ रोग से पीडि़त अवस्था में आया था। यहाँ आर्य समाज के प्रो. राममूर्ति, मास्टर आत्माराम अमृतसरी, कुंवर सुखलाल आर्य मुसाफिर, अमर स्वामी जैसे क्रान्तिकारी महानुभावों का आगमन हुआ। मेरे प्रपितामह श्री देवीसिंह सिसोदिया से ही परिवार आर्य समाजी तथा स्वाधीनता संग्राम व शुद्धि आन्दोलन से जुड़ा रहा। मेरे पिता श्री इन्द्रपालसिंह सिसोदिया एवं माता श्रीमती ओम्वती देवी थे।

अभिरुचि एवं शिक्षा

सत्य, अहिंसा, अस्तेय के प्रति जन्म से ही गहरी निष्ठा रही है। देशभक्ति, स्वाभिमान व न्यायप्रियता के संस्कार वंश परम्परा से प्राप्त। गणित तथा भौतिक विज्ञान विशेषकर परमाणु-नाभिकीय व सृष्टि विज्ञान में विशेष ऊहा प्रारम्भ से। उच्च माध्यमिक कक्षा का विद्यार्थी रहते हुए पत्र व्यवहार से रुड़की विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग से भौतिकी सम्बन्धी प्रश्न करता रहा, जिनसे वह विश्वविद्यालय भी प्रभावित व हतप्रभ रहा। स्कूल शिक्षा के समय ही महान् परमाणु वैज्ञानिक बनने की इच्छा परन्तु पारिवारिक परिस्थितिवश कालेज शिक्षा को अधूरी छोड़कर राजस्थान में पशुपालन विभाग में सेवा की। इस सेवा को अपने सत्यव्रत व प्रतिभा के अनुकूल न जानकर तथा राष्ट्र व विश्व की कुछ विशेष सेवा करने हेतु लगभग सवा पांच वर्ष सेवा के पश्चात् मार्च 1988 में शासकीय सेवा से त्यागपत्र देकर वेद मन्दिर, मथुरा के श्रीमद् आचार्य प्रेमभिक्षु जी महाराज से नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली। वहीं उन्हीं से दीक्षित आचार्य स्वदेष जी से संस्कृत व्याकरण का कुछ अध्ययन किया। अस्वस्थता आदि कारणों से मथुरा को छोड़ आर्य समाज, भीनमाल (जालोर) राजस्थान में 12-13 वर्ष रहा। लगभग 13 माह ऋषि उद्यान, परोपकारिणी सभा, अजमेर में भी रहा। इस अन्तराल में सामाजिक कार्य, वेद प्रचार, समीक्षात्मक, समालोचनात्मक, विचारोत्तेजक लेखन, शोध लेखन, राष्ट्रिय व अन्तर्राष्ट्रिय वेद गोष्ठियों में पत्र वाचन करता रहा। अन्त में छण्च्ण्ब्ण्प्ण्स्ण् मुम्बई के एडीशनल चीफ इंजीनियर श्री विजयकुमार भल्ला, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई के प्रख्यात भारतीय खगोलशास्त्री श्री प्रोफेसर आभास मित्रा तथा अन्य वैज्ञानिक डा. जगदीशचन्द्र व्यास के सम्पर्क व सुझाव पर अपना लक्ष्य केवल वैदिक विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करना निश्चित किया। मेरी अध्ययन शैली सबसे पृथक् ही रही है, चाहे वह गणित व भौतिक विज्ञान का क्षेत्र हो अथवा वैदिक शास्त्रों का क्षेत्र। वेद, दर्शन, उपनिषद्, मनुस्मृति, वाल्मीकीय रामायण, महाभारत, निरुक्त, शिक्षा, छनदशास्त्र, महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत सम्पूर्ण साहित्य, विभिन्न शीर्ष आर्य विद्वानों का साहित्य व वर्तमान में ब्राह्मण ग्रन्थ सभी स्वयमेव अध्ययन किया वा करता रहा हूँ। इसके अतिरिक्त प्रचलित पुराण, कुरान, बाईबिल, धम्मपद आदि अनेक सम्प्रदायों के ग्रन्थों का भी स्वयं ही विहंगावलोकन किया है। वर्तमान भौतिक विज्ञान के उच्च स्तरीय साहित्य का भी स्वयं ही आवश्यकतानुसार अवलोकन करता रहा हूँ। ऊहा व तर्क की प्रधानता देना मेरा स्वभाव रहा है। ऐतरेय ब्राह्मण का मेरा वैज्ञानिक व्याख्यान भी वैदिक विज्ञान को समझने की ऐसी शैली को प्रस्तुत करता है, जो कदाचित् महाभारत काल तक प्रचलित थी तथा इसी के आधार पर हमारा राष्ट्र विश्वगुरु कहलाता था। अपने अनुसंधान कार्य को विधिवत् करने हेतु श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास की स्थापना मई 2003 में गुजरात के स्वामी धर्मबन्धु जी के सुझाव पर की। इसी न्यास के अन्तर्गत सन् 2007 में वेद विज्ञान मन्दिर (वैदिक एवं आधुनिक भौतिक विज्ञान शोध संस्थान) की नींव डाली एवं वर्तमान में स्थायी रूप से यहीं रहकर अपना कार्य कर रहा हूँ।

प्रमुख लक्ष्य, वर्तमान गतिविधियां व आगामी योजना

मैंने किशोर वय से ही आधुनिक भौतिक विज्ञान की कई समस्याओं को समझने का प्रयास किया है। कई अनसुलझे रहस्यों को जाना है। बचपन से ही आर्य वैदिक परम्परा में जन्मा व पला होने के कारण वेदादि शास्त्रों व ऋषि-मुनियों की महती विद्या-विज्ञान के विषय में सुना है। महर्षि दयानन्द सरस्वती के अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश को ग्यारहवीं कक्षा का छात्र रहते सन् 1978 में पढ़ा और पढ़कर ही आजीवन ब्रह्मचारी रहकर आर्य समाज, देश व मानवता की सेवा का मन ही मन संकल्प कर लिया। मेरे विचार में सुशिक्षा से ही किसी व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। कुशिक्षा से इन सभी का विनाश भी हो सकता है। अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा को लागू करके, हमारे शास्त्रों को नीचा दिखाकर भारतीयों के स्वाभिमान, सम्मान व संस्कारों को सर्वथा नष्ट कर दिया, जबकि सात सौ साल के आक्रान्ता मुसलमान खून बहाकर भी हमारे संस्कारों को नष्ट नहीं कर सके। आज देश में जो व्यक्ति जितना अधिक प्रबुद्ध माना जाता है, वह उतना ही अधिक भारतीय इतिहास, संस्कृति, वैदिक शिक्षा व संस्कारों का विरोधी तथा पाश्चात्य सभ्यता, इतिहास व शिक्षा का दास बना हुआ है। उसका राष्ट्रिय स्वाभिमान एवं सम्मान पूर्ण नष्ट है। उसका दासत्व भाव चरम पर है। उसे अपने ही पूर्वजों को अपमानित करने तथा विदेशियों की गौरव गाथा गाने में गर्व की अनुभूति होती है। इस दास मनोवृत्ति को वह प्रगतिशीलता एवं कथित सैक्यूलरिज्म का प्रमाण मानता है।

मेरे विचार से इसका कारण यह है कि वर्तमान शिक्षा में जन्मा, पला, बढ़ा भारतीय आत्म-अवमानना की दुःखद भावना से ग्रस्त है। वेदादि शास्त्रों, ऋषियों-देवों के ज्ञान विज्ञान को समझने-समझाने वाले विद्वान् आज सम्पूर्ण भारत वर्ष में नगण्य हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इसके कुछ संकेत अपने ग्रन्थों में किये हैं परन्तु दुर्भाग्य कि उनके अनुयायी आर्य विद्वान् भी उन्हें पूर्णतः नहीं समझ पाये हैं। अन्य हिन्दू धर्माचार्य, विद्वान्, इस्लामी, ईसाई, जैन, बौद्ध सभी ने महर्षि दयानन्द सरस्वती तथा आर्य विद्वानों को नाना वैर-विरोधों शास्त्रार्थों में उलझाये रखा। अपने-2 सम्प्रदायों की समृद्धि में संलग्न कथित विद्वान्, धर्माचार्य वैदिक विद्या की सार्वभौमिकता को समझने में किच्चिद् भी प्रवृत्त नहीं हुए बल्कि उसको साम्प्रदायिक दृष्टि से देखकर विरोध में ही लग रहे किंवा केवल कर्मकाण्ड में ही उलझकर महान् ज्ञान-विज्ञान एवं मानवीय दृष्टिकोण से दूर ही रहे। इससे मैकाले का भक्त प्रबुद्ध वर्ग वेद-शास्त्रों, भारतीय इतिहास, संस्कार आदि का विरोधी बनने को विवश हो गया। इसी कारण आज देश की यह दुर्दशा है कि हमारा मीडिया, समस्त प्रबुद्ध वर्ग व राजनैतिक वर्ग विदेषी आदर्शों, नीतियों, परम्पराओं का ही संवाहक बन गया है। भारतीयता को साम्प्रदायिक एवं रुढि़वादी परम्परा के रूप में देख रहा है।

ऐसे विकट समय में मैंने यह निश्चय किया है कि मैं वैदिक ज्ञान विज्ञान के हजारों वर्षों से लुप्त हुए गम्भीर विज्ञान को संसार के समक्ष प्रकाशित करूं, इसके साथ ही वर्तमान विज्ञान की दुर्बलताओं, न्यूनताओं वा उलझनों को भी समझने का प्रयास करूं। कहाँ वर्तमान भौतिक विज्ञान असहाय है, अपूर्ण है और उसे कहाँ किसी सहारे व संकेत की आवश्यकता है? जिससे वह अपने अनुसंधान को और भी गहराई तक ले जा सके। इसी को जानने हेतु मैं भारत के कई प्रख्यात् भौतिक विज्ञानियों से संवाद करता रहा हूँ। इनमें से मेरे हितचिन्तक प्रमुख माननीय भौतिक वैज्ञानिक निम्नानुसार हैं-

अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिर्लब्ध भारतीय खगोलषास्त्री व सृष्टि विज्ञानी प्रो. आभास मित्रा, प्रोफेसर, होमी भाभा नेषनल इंस्टीट्यूट एवं भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई, इण्डियन न्यूट्रिनो आॅब्जर्बेट्री के हैड तथा टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ फण्डामेंटल रिसर्च, मुम्बई के प्रोफेसर एन.के. मण्डल, एवं इसी टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ फण्डामेंटल रिसर्च, मुम्बई के ही अंतरिक्ष विज्ञानी प्रो. ए.आर. राव, प्रख्यात ग्रह वैज्ञानिक प्रो. नरेन्द्र भण्डारी तथा खगोलशास्त्री प्रो. पंकज जोशी टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ फण्डामेंटल रिसर्च, मुम्बई, प्रो. अशोक अम्बास्था (सौर वेधशाला, उदयपुर), प्रो. चचेरकर (तत्कालीन निदेशक, रक्षा प्रयोगशाला, जोधपुर), वीर नर्मद द. गुजरात विश्वविद्यालय, सूरत के भौतिकी के प्रोफेसर के.सी. पोरिया आदि। प्रो. अजीतराम वर्मा (पूर्व निदेशक- भौतिक विज्ञान प्रयोगशाला, नई दिल्ली) इनसे केवल एक बार ही संक्षिप्त चर्चा हुई थी।

इन सबसे मुझे भौतिक विज्ञान की धारणाओं को समझने में बहुत सहयोग मिला है। प्रो. मित्रा साहब से अगस्त 2004 से ही सतत संवाद सम्पर्क रहा है। इधर वैदिक क्षेत्र में मैंने अभी-2 05.11.2015 को ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ ऐतरेय ब्राह्मण जो सभी ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वाधिक प्राचीन माना जाता है तथा जिसका काल महाभारत युद्ध से भी हजारों वर्ष पुराना है, का वैज्ञानिक भाष्य पूर्ण किया है। अभी उसे एक बार पढ़कर वर्तमान वैज्ञानिकों को समझने हेतु विस्तृत भूमिका, परिशिष्ट आदि का लेखन कार्य शेष है, जो ईशकृपा व स्वास्थ्यादि की अनुकूलता रही तो आगामी दीपावाली तक हो सकता है। इस ग्रन्थ का वैज्ञानिक भाष्य मेरी जानकारी के अनुसार सम्भवतः विश्व में कहीं नहीं हुआ है। इस ग्रन्थ की रहस्यमयी भाषा के न समझने से संसार में मांसाहार, पशुबलि, हिंसा आदि से परिपूर्ण घृणित व बीभत्स कथित यज्ञों अन्य परम्परा रुपी घोर पाप का प्रचार हुआ है परन्तु मेरे वैज्ञानिक व्याख्यान से वर्तमान भौतिक विज्ञान विशेषकर काॅस्माॅलोजी, एस्ट्रोफिजिक्स, ऐस्ट्रोनाॅमी, पार्टिकल-न्यूक्लीयर-एटॅमिक फिजिक्स, सोलर-प्लाज्मा फिजिक्स आदि की अनेक गम्भीर अनसुलझी समस्याओं का समाधान हो सकेगा। बिग बैंग माॅडल, एटरनल यूनीवर्स, स्टिंªग थ्यौरी आदि वर्तमान अवधारणाओं से हटकर एक नवीन अद्भुत् सृष्टि विज्ञान का प्रकाश होगा, जिस पर भौतिक विज्ञानी वर्षों तक शोध करते रह सकेंगे। मेरे ऐतरेय वैदिक विज्ञान में बिग बैंग माॅडल, एटरनल यूनीवर्स व स्ट्रिंग थ्यौरी के प्रमुख गुण तो समाविष्ट होंगे परन्तु उनके दोष नहीं होंगे। इस कार्य से जहाँ विश्व को वैदिक विज्ञान की उत्कृष्टता विदित होगी, वहीं इससे वेदों, ऋषियों, देवों की विश्व में प्रतिष्ठा स्थापित होगी। इसके साथ ही भारतीय कथित प्रबुद्ध वर्ग के मृत राष्ट्रिय स्वाभिमान का उदय होकर प्राचीन भारतीय गौरव का बोध होकर भारत को जगद्गुरु बनाने की दिशा में बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा।

इस वैदिक विज्ञान से वैदिक धर्म की सार्वभौमिकता स्थापित होकर संसार के मिथ्या मत-पंथों के जंजाल से मानवमात्र को मुक्त करके विश्व भर में शान्ति व आनन्द का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक मार्ग मिल सकेगा। इस कार्य से भारतीय व विश्व समाज की अनेक सामाजिक, साम्प्रदायिक, राजनैतिक, भौगोलिक, पर्यावरणीय व आर्थिक आदि समस्याओं के समाधान हेतु वैदिक सद्ग्रन्थों के मार्गदर्षन प्राप्त करने के प्रति उत्साह बढ़ेगा। वैदिक ग्रन्थों के नाम पर चल रही मिथ्या परम्परा को भी परिष्कृत होने का सुअवसर प्राप्त होगा। यज्ञ, योग, गोरक्षा व समस्त प्राणिमात्र के प्रति प्रेम की महत्ता ज्ञात होगी। विश्व से आतंकवाद, निर्धनता, असमानता, अशिक्षा, पर्यावरण प्रदूषण, स्वेच्छाचारिता जैसे- दुराचार आदि से मुक्ति मिलेगी। इससे सभी मानव सुखी, स्वस्थ व आनन्दित होंगे, यही मेरे शोध कार्य का उद्देश्य है। ईश्वर की महती अनुकम्पा, देश के वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों, दानवीरों, राष्ट्रभक्तों व सच्चे धार्मिक प्रबुद्ध महानुभावों के सहयोग से यह कार्य अवश्य ही पूर्ण होगा, ऐसी मैं आशा करता हूँ।

धार्मिक दृष्टिकोण

धर्म दो प्रकार का होता हैै। चेतन का धर्म जानना अध्यात्म विज्ञान कहा जाता है, जिसे ही प्रायः धर्म नाम दिया जाता है। जड़ पदार्थों का धर्म जानना पदार्थ विज्ञान कहा जाता है, जिसे आज विज्ञान कहा जाता है। इन दोनों ही धर्मों (विज्ञानों) की उत्पत्ति ईश्वर से हुई हैै। ईश्वर आस्थाओं, विश्वासों से मान लेने वाला कल्पित तत्व नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विज्ञान के नियमों का निर्माता नियामक चेतन निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ तत्व है। इस कारण ब्रह्माण्ड भर में केवल एक ही ईश्वर है। इस कारण जैसे ईश्वर का बनाया विज्ञान समस्त मानव जाति के लिए एक है, वैसे ही अध्यात्म विज्ञान (धर्म) भी एक ही होना चाहिए। देश, काल, वर्ग का भेद जैसे विज्ञान में नहीं होता, वैसे ही धर्म में भी नहीं हो सकता। इस कारण समस्त मानव जाति को ऐसे वैज्ञानिक धर्म को जानने के प्रति पुरुषार्थ करना चाहिए, जो सृष्टि उत्पत्ति के प्रारम्भ से ही चला आया है। इससे साम्प्रदायिक उन्माद समाप्त होकर मानव एकता स्थापित होकर विश्व में शान्ति हो पायेगी। सभी को मिथ्या कल्पित सम्प्रदायों के अन्धविश्वासों व पाखण्डों के जाल से मुक्त होकर एक धर्म की स्थापना का प्रयास करना चाहिए। हमारी दृष्टि में वैदिक धर्म ही ईश्वरीय धर्म व सृष्टि के आदि काल से चला आया धर्म है। इसी से विज्ञान की भी उत्पत्ति हुई है। इस पर मैत्री पूर्ण संवाद सबको करना चाहिए।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

मेरी दृष्टि में शिक्षा का सबसे प्रधान विषय विज्ञान ही है परन्तु विज्ञान का तात्पर्य केवल टैक्नोलाॅजी का ग्रहण करना उचित नहीं है। टैक्नोलाॅजी का अत्यधिक उत्कर्ष विनाशकारी होता है। मेरी दृष्टि में वर्तमान समय में मानव प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ का भोग करना चाहता है और इसी भोगलिप्सा में नाना प्रकार की टैक्नोलाॅजी का विकास हो रहा है। मूलभूत भौतिकी पर ध्यान कम तथा टैक्नोलाॅजी पर ध्यान अधिक है। मूलभूत भौतिकी की आधी अधूरी जानकारी होते ही उससे टैक्नोलाॅजी के विकास पर प्रबल पुरुषार्थ किया जाता है और भौतिकी के सूक्ष्म व गम्भीर ज्ञान न होने से उस पर आधारित टैक्नोलाॅजी अनेक दुष्प्रभावों को जन्म देती है। आज कोई ऐसी टैक्नोलाॅजी नहीं जो दुष्प्रभावों को जन्म न दे रही हो। सुख सुविधाओं की लालसा ने विश्व के पर्यावरण तंत्र को नष्ट भ्रष्ट कर दिया है। अनेक प्रजातियां लुप्त हो गयी हैं, हो रही हैं। जिस मानव के लिए ये सुख सुविधाएं जुटाई जा रही हैं, वह मानव भी कब तक इस पृथिवी पर रह पायेगा, इसे कोई नहीं जानता। वस्तुतः मानव को इस सृष्टि का गम्भीर ज्ञान नहीं है। वह स्थूलता को ही सर्वस्व मान बैठा है। जब वह मूल कणों, ऊर्जा आदि के पार अधिक गहराई में अनुसंधान करेगा, तब उसे अन्य आकाश, प्राण, मन, छनद आदि सूक्ष्म जड़ तत्वों का भी बोध होगा। उन सूक्ष्म तत्वों के पीछे उनसे भी सूक्ष्म आत्म व परमात्म तत्वों का भी बोध होगा। तब उसे बोध होगा कि मानव का स्वरूप व उद्देश्य क्या है? तब वह भौतिक विज्ञान के गम्भीर रहस्यों को जानकर नितान्त भोगवादी बनकर अनावश्यक तकनीक का आविष्कार न करके निरापद व विशेष आवश्यक तकनीक का ही प्रयोग करता हुआ अपने आत्म स्वरूप व परमात्मा के स्वरूप को जानने का प्रयास करेगा। तब पदार्थ विज्ञान क्रमशः विकास करता हुआ अध्यात्म विज्ञान के आनन्द में रमण करेगा। ध्यातव्य है कि आत्मा व ईश्वर का क्रिया विज्ञान वर्तमान किसी भी क्रिया विज्ञान से अधिक सूक्ष्म व महान् है। आज वैज्ञानिकों की दिशा इससे सर्वथा विपरीत है। वे कहते हैं कि विज्ञान ‘क्यों’ प्रश्न का उत्तर नहीं देता। मैं पूछता हूँ कि क्या ‘क्यों’ कोई प्रश्न नहीं है? वस्तुतः ‘क्यों’ ‘किसने’ ‘किसके लिए’ ऐसे मूलभूत प्रश्न हैं, जिनके बिना किसी भी बुद्धिमान् मनुष्य का जीवन ही व्यर्थ है। ‘क्यों’ प्रश्न प्रयोजन का आविष्कारक है। प्रयोजन (उद्देष्य) हीन जीवन पशु तो जी सकते हैं परन्तु क्या मनुष्य को भी ऐसा पशुतुल्य ही निष्प्रयोजन जीवन जीना चाहिए? विज्ञान को ‘क्यों’ का महत्व समझना चाहिए, जिस दिन विज्ञान इसे समझेगा, तभी विज्ञान संसार को कल्याण व आनन्द का मार्ग दे सकेगा अन्यथा वर्तमान विनाष का मार्ग तो स्पष्ट है ही। विज्ञान जो अनुसंधान कर रहा है, क्या उसका प्रयोजन जानना उसका कर्तव्य नहीं? यही तो ‘क्यों’ प्रश्न का उत्तर सिखायेगा।

सामाजिक दृष्टिकोण

इस विश्व में वेदों के अनुसार भगवान् मनु महाराज ने मनुस्मृति में सम्पूर्ण मानव धर्म का विधान किया है। दुर्भाग्य से मध्य काल में कुछ स्वार्थी व दुष्ट जनों ने इसमें अनेक प्रक्षेप (मिलावट) करके जातिवाद, छूआछूत, नारी के प्रति घृणा का भाव उत्पन्न करने वाले सैकड़ों श्लोक लिख दिये। इससे भारत में नारी व शूद्र के प्रति घृणा का ताण्डव हुआ। कर्मणा वर्ण व्यवस्था दुःखद जन्मना जाति व्यवस्था में परिवर्तित होकर भारतवर्ष का सामाजिक ढांचा छिन्न-भिन्न व राष्ट्र का घोर पतन पराधीनता के रूप में हुआ। शूद्र के सर्वाधिक हितैषी भगवान् मनु को शूद्र विरोधी घोषित किया गया। आज विशुद्ध मनुस्मृति की व्यवस्था से ही राष्ट्र व विश्व की सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है। जन्मना जाति व्यवस्था को समाप्त करके जाति व मजहबों के नाम पर सामाजिक व राजनैतिक भेद भाव समाप्त करके कर्मणा वर्ण व्यवस्था लागू होनी चाहिए। देश के सभी बच्चे बिना किसी भेद भाव के एक जैसी शिक्षा, खान-पान, रहन-सहन, भाषा, वेश-भूषा से युक्त आवासीय विद्यालयों में अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करें। राष्ट्रपति से लेकर भिक्षुक तक बच्चे के जीवन स्तर में पूर्ण समानता हो। उसके पश्चात् शिक्षा पूर्ण होने पर यथायोग्य कार्य मिले। तब न कोई छूआछूत, असमानता, शोषण का शिकार होगा और न कोई आरक्षण की आवश्यकता अनुभव करेगा। निजी शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगे। इससे भारत की सभी सामाजिक समस्याएं सदा के लिए समाप्त हो जायेगी। नारी का पूर्ण सम्मान हो परन्तु स्वतंत्रता के नाम पर स्वेच्छाचारिता कदापि न हो। वैदिक व्यवस्था व मर्यादा का पालन ही समाज व परिवार को उन्नत बना सकता है।

राष्ट्रिय वा राजनैतिक दृष्टिकोण

गुण व योग्यता की उपेक्षा पर आधारित वर्तमान लोकतंत्र राष्ट्र के पतन का मूल कारण है। जहाँ योग्यता व सदाचार की उपेक्षा हो, वह राष्ट्र कदापि सुखी नहीं हो सकता। राष्ट्र के नायकों (जनप्रतिनिधियों) के लिए उच्च योग्यता व सदाचार के कठोर मानदण्ड होने चाहिए। अपराधी, अज्ञानी, स्वेच्छाचारी व्यक्ति कैसे देश की जनता का भला कर सकता है? देश के प्रत्येक निवासी को देश के प्राचीन इतिहास, ज्ञान विज्ञान, संस्कृति का पूर्ण ज्ञान व उसमें प्रबल श्रद्धा होनी चाहिए। विश्व बन्धुत्व व मिथ्या सेक्यूलारज्म के नाम पर राष्ट्रिय गौरव को नष्ट करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। जो देश अपने स्वाभिमान, सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता, अपने पूर्वजों को सम्मान नहीं दे सकता, वह संसार का भी कभी भला नहीं कर सकता। शक्तिशाली, सदाचारी व ज्ञानी की ही पूजा संसार में होती है। ये गुण भी प्राचीन भारतीय ज्ञान विज्ञान से अर्जित किये जायें, तभी राष्ट्रिय स्वाभिमान समृद्ध होकर विश्व में सम्मान प्राप्त किया जा सकता है। बिना सदाचार केवल शक्ति मनुष्य को राक्षस बना देती है। देष केवल राजनेताओं, उद्योगपतियों, फिल्मी कलाकारों एवं कुछ खिलाडि़यों को सुखी बनाने से सुखी नहीं होगा बल्कि देश के अन्नदाता किसान, मजदूर, देश के रक्षक सैनिक तथा देश को विज्ञान देने वाले वैज्ञानिकों के हित में नीतियां बनाने से ही देश सुखी, समृद्ध व सशक्त होगा। राष्ट्रिय शिक्षा नीति प्राचीन शिक्षा पद्धति की अनुगामिनी हो। राष्ट्रिय संविधान को प्राचीन ग्रन्थों वेदों (विषुद्ध मनुस्मृति, विदुर नीति, शुक्रनीति, चाणक्य नीति, कौटिल्य अर्थशास्त्र, रामायण व महाभारत आदि) बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। हमारे वैदिक विज्ञान शोध से इन महान् ग्रन्थों का महत्व ज्ञात हो सकेगा।

आर्थिक दृष्टिकोण

आर्थिक स्थिति चन्द व्यक्तियों से जुडे़ शेयर मार्केट अथवा औद्योगिक विकास से ही तय नहीं हो सकती बल्कि देश के मजदूर, कृशक सहित प्रत्येक वर्ग की सुख समृद्धि से तय होनी चाहिए। देश की युवा पीढ़ी में सुविधाओं की अनावश्यक भूख उत्पन्न करके अराजकता व अपराधों की ओर धकेलना अति घातक है। अनावश्यक सामग्री उत्पन्न करने वाले उद्योगों के स्थान पर स्वस्थ व समृद्ध कृषि, वैज्ञानिक ढंग से सम्पन्न गोपालन से ही राष्ट्र सुखी रह सकता है। कृषि, पशुपालन पर विशेष अनुसंधान हो। मांस व शराब आदि नशीले पदार्थों की बिक्री से राजस्व जुटाना घोर कुकर्म है। सुख सुविधाओं की उपलब्धता को ही विकास का प्रतीक मानना मूर्खता है। स्वास्थ्यवर्धक जल, वायु व भोजन ही सर्वोच्च भौतिक आवश्यकता है। स्वदेशी चिकित्सा पद्धति, योग, व्यायाम, संयमित जीवन को प्रोत्साहित करना चाहिए। आर्थिक असमानता को रोकना अति आवश्यक हैै। किसान, पशुपालक व मजदूर के परिश्रम का मूल्य देश को समझना चाहिए। इनके विपन्न रहने से देश को सम्पन्न मानना अपराध है। गौ के अर्थशास्त्र पर भी विशेष अनुसंधान अपेक्षित है। अनावश्यक मशीनीकरण ने गोहत्या में भारी योगदान दिया है। इसे रोक कर पशु आधारित कृषि ही स्थायी लाभ दे सकती है। मशीनी कृषि व रासायनिक उर्वरक से भूमि अधिक दिन तक उपजाऊ नहीं रह पायेगी।